election in 2014 in india
Loksabha of the honest in 2014

कांग्रेस या भाजपा या सपा या बसपा ने जिसको टिकेट दे दिया उनमें
से एक को चुनना हमारी मजबूरी है? क्यों?? हमें देश भर से ऐसे अन्ना हज़ारे जैसे 544 चरित्रवान् व्यक्ति
चाहिएं जो लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में बैठ कर उसे सचमुच
मंदिर सा पवित्र बना सकें. यह काम 2014 के चुनाव में हो कर रहेगा. तय्यारी अभी से शुरू
होगी. हमारा तरीक़ा बहुत व्यावहारिक है, इस के बारे में हर एक को
बताएँ. यह आपके हिस्से की देश सेवा होगी. अपने सुझाव लिखें.
Whole format will be written by the end of September. Meanwhile write your
suggestions to jyoti@newsjyoti.com
and also write 'I am Anna Hazare' at IamAnnaHazare.com
साबित करने के लिए एक अजीब ही खबर सुनने को मिली है. खबर आई है बिहार के सुशासन से.
राज कर रही पार्टी को एक सीट के लिए एक 'लायक' उम्मीदवार चाहिए था. यह फ़ैसला उसने पहले ही कर लिया था कि इस सीट पर तो एक ख़ास बाहुबली का ही अधिकार है. मगर झोल यह था कि इस भविष्य के 'सुशासन' चलाने वेल पर अभी से कुछ अपहरण, हत्या और बलात्कार के मामले चल रहे थे. तो क्या करें? आइडिया यह निकाला गया की इस व्यक्ति की फटाफट शादी करवा दी जाए और 'राजपाट' का दायित्व महाराजा की बजाए महारानी को सौंप दिया जाए. सो आनन-फानन में विगयापन निकाला गया कि राज करने के लिए एक कन्या की ज़रूरत है, तो क्या हुआ अगर होने वाला पति उस तरह का है. फटाफट कन्या भी मिल गयी. कहने की ज़रूरत तो नहीं कि जिसने इतना बड़ा 'त्याग' कर दिया जनता की 'सेवा' के लिए, वो 'देवी' कैसी होगी! 'राज' तो 'देवी-देवता' को मिल कर ही करना है, एक से भले दो, अगर एक से बढ़कर एक हों तो! जनता तो 'बेचारी' है और बेचारी ही रहेगी. उसे तो लुटना ही है. जीत भी पक्की है, क्योंकि जनता के पास कोई विकल्प भी नहीं है. ये नहीं तो फिर वही पार्टी जिसने 15 साल राज करके राज्य को 'भिखारी-प्रधान' राज्य बना दिया था, यहाँ तक कि गोआ के मुख्य-मंत्री ने बिहार से सीधी ट्रेन चलाने पर ऐतराज़ ही जाता दिया था यह कहकर कि इससे गोआ में भिखारी बहुत आ जाएँगे.
खैर कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस 'युद्ध' में जीते कोई भी, हार तो देश की और देशवासियों की ही है. तो अब क्या करें? छोड़ दें देश को उसके नसीब पे,
और साथ में
खुद को भी? एक चुनाव क्षेत्र में 20 लाख वोटर होते है, तो क्या 2 लाख भी पढ़े-लिखे नहीं होंगे? 2 लाख में से अगर 2 हज़ार भी ठान लें तो इस देश की तक़दीर बदली जा सकती है. हर
क्षेत्र से सिर्फ़ एक, सिर्फ़ एक अन्ना हज़ारे जैसा
ईमानदार व्यक्ति हमें ढूंड कर निकालना है, उसे चुनाव में एक 'निर्दलिए' के रूप में खड़ा करना है, अपने आसपास घर-घर में जा कर उसका परिचय देना है. जी हाँ, वोट 'माँगने' की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, जनता जो कि खुद त्रस्त है, इसी मौके की तलाश में है.
इस सब में अन्ना हज़ारे का क्या रोल होगा?
इस सब में अन्ना हज़ारे का क्या रोल होगा? आज अमीर हो या ग़रीब, पढ़ालिखा हो या अनपढ़, देश के लगभग 80% लोग अन्ना को 'मान' चुके हैं और उनके मुरीद हैं. अन्ना खुद ज़िंदगी में कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे. बाहर बैठ कर ही काम करना चाहते हैं. उनके सहयोगी जब यह सुन-सुन कर तंग आ गये कि अपनी आवाज़ सुनवानी है तो चुनाव जीत कर आओ, तो यह कहने लगे कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए चुनाव जीत कर आना ज़रूरी है? ऐसे में अन्ना के मुँह से एक बात निकली थी जो मैने पकड़ ली है. उन्होने कहा था कि अगर कोई ईमानदार उम्मीदवार खड़ा होगा तो मैं उसके प्रचार के लिए उसके मंच पर ज़रूर जाऊँगा.
खड़ा होगा का क्या मतलब है, हम तो ईमानदार उम्मीदवार खड़ा करेंगे ही उनकी सहमति से! दरअसल मेरा प्लान यह है कि हमने किसी के घर किसी के लिए वोट माँगने नहीं जाना. हमने तो अपने आसपास यह प्रचार करने से शुरू होना है कि इस तरह से हम एक उम्मीदवार की तलाश में हैं, जो अन्ना के आशीर्वाद के लायक हो. देखिएगा कुछ दिन में लोग आपसे खुद ही उत्सुकतावश पूछेंगे कि क्या वो उम्मीदवार मिला?!
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